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कौन है पंडित सुनील भराला?

उत्तर प्रदेश ही नही,पूरे देश मे है बड़ी पहचान

 

संघ और जनसंघ की वैचारिक विरासत से निकली राजनीतिक यात्रा, संगठन निर्माण और सामाजिक सक्रियता ने बनाई अलग पहचान
ओजस्वी मन | मेरठ/गाजियाबाद
संपादक—पं. दीपक कृष्णात्रेय

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय पूर्व राज्यमंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा नेता पंडित सुनील भराला एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा के केंद्र में हैं। गाजियाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा पण्डित सुनील भराला को लेकर की गई टिप्पणी ने उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और सामाजिक सक्रियता को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम, गाजियाबाद में आयोजित अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश में कहीं भी ब्राह्मण समाज की बात आती है तो सुनील भराला का नाम सबसे पहले सुनाई देता है।ब्रजेश पाठक की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां लगातार तेज हैं। सुनील भराला की पहचान हालांकि किसी एक राजनीतिक पद या सामाजिक संगठन तक सीमित नहीं है। संघ और जनसंघ की वैचारिक पृष्ठभूमि से निकले परिवार में राजनीतिक संस्कार पाने वाले सुनील भराला ने छात्र जीवन से संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की और आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया।

राजनीतिक संस्कार परिवार से मिले, पहचान अपने संघर्ष से बनाई

सुनील भराला की राजनीतिक यात्रा उनके दादा स्व.पं. दयाराम भारद्वाज के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से वर्ष 1942 से पूर्ण निष्ठा से जुड़े रहने और राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण से शुरू होती है।राष्ट्र प्रेम के लिये समर्पित दूसरी पीढ़ी में उनके पिता स्वर्गीय पंडित मलखान सिंह भारद्वाज ने 1960 में कमान संभाली , जो 1981 तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक एवं जनसंघ के लिये जीवन न्यौछावर कर अमिट छाप छोड़ गए। उनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे और प्रचारक एवं विस्तारक के रूप में संगठन के लिए कार्य किया। इसके बाद उन्होंने भारतीय जनसंघ की सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया।मलखान सिंह भारद्वाज का तत्कालीन जनसंघ नेतृत्व से निकट संपर्क रहा। वर्ष 1969 में वह सरधना विधानसभा के प्रभारी बने और 1974 में उन्होंने भारतीय जनसंघ के टिकट पर सरधना विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। उनके चुनाव प्रचार में तत्कालीन जनसंघ नेता अटल बिहारी वाजपेयी की सभा भी हुई थी।इसी राजनीतिक वातावरण में सुनील भराला के प्रारंभिक राजनीतिक संस्कार विकसित हुए। पारिवारिक वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने स्वयं भी संगठन और समाज के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भाजपा की सक्रिय राजनीति तक                                                            राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं जनसंघ के लिये समर्पित अपने पूर्वजों की तीसरी पीढ़ी की कमान परिवार के बड़े पुत्र पं. सुनील भराला ने संभाली और भारतीय जनता पार्टी के गठन से लेकर अब तक अपने सम्पूर्ण जीवन को पार्टी हित मे समर्पित कर दिया।पं.सुनील भराला ने अपनी यात्रा 1989 में Abvp से प्रारंभ की।उनके पूरे परिवार में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्कार पूर्णतः दृष्टिगोचर होते हैं।सुनील भराला का राजनीतिक सफर छात्र जीवन से संगठनात्मक गतिविधियों के साथ आगे बढ़ा। भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चे से लेकर जिला, मंडल, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक उन्होंने विभिन्न जिम्मेदारियां संभालीं।भाजपा युवा मोर्चा में जिला एवं मंडल स्तर की जिम्मेदारियों से शुरुआत करते हुए वे राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य तक पहुंचे। इसके बाद प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, प्रदेश मंत्री तथा भाजपा किसान मोर्चा उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष जैसे दायित्व भी उन्होंने संभाले।उत्तर प्रदेश सरकार में श्रम कल्याण परिषद के अध्यक्ष एवं राज्यमंत्री स्तर की जिम्मेदारी ने उनके राजनीतिक सफर में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा। विभिन्न विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रभारी एवं संयोजक के रूप में भी उन्होंने संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाईं।मेरठ, बिजनौर, नगीना, बदायूं, देवबंद और हमीरपुर सहित कई राजनीतिक क्षेत्रों में चुनावी संगठन से जुड़ी जिम्मेदारियों ने उन्हें जमीनी राजनीति और कार्यकर्ता आधारित संगठन का व्यापक अनुभव दिया।

सरकारी दायित्व से संगठनात्मक सक्रियता तक

उत्तर प्रदेश सरकार में श्रम कल्याण परिषद के अध्यक्ष एवं राज्यमंत्री के रूप में सुनील भराला ने श्रमिक कल्याण से जुड़े विषयों पर काम किया। खादी ग्रामोद्योग आयोग, भारत सरकार से जुड़े दायित्वों में भी उनकी भूमिका रही।भाजपा किसान मोर्चा और युवा मोर्चा सहित संगठन के विभिन्न दायित्वों के माध्यम से उनकी राजनीतिक सक्रियता लगातार बनी रही। संगठनात्मक कार्यों के साथ चुनावी प्रबंधन में उनकी भूमिका ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बाहर भी उनकी राजनीतिक पहचान को विस्तार दिया।

राष्ट्रीय परशुराम परिषद ने बढ़ाया सामाजिक दायरा

सुनील भराला की सार्वजनिक पहचान को व्यापक बनाने में राष्ट्रीय परशुराम परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। परिषद के संस्थापक के रूप में उन्होंने भगवान परशुराम से जुड़े धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विषयों को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में कार्यक्रमों और आयोजनों को आगे बढ़ाया।हरिद्वार में राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी एवं संत समागम, काशी के कार्यक्रम तथा वर्ष 2025 के महाकुंभ में परिषद की गतिविधियां उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक सक्रियता के प्रमुख पड़ाव रहे।परिषद की गतिविधियों में धार्मिक आयोजनों के साथ सामाजिक जागरूकता, सनातन संस्कृति, सामाजिक संगठन और भगवान परशुराम के आदर्शों से जुड़े विषयों को भी प्रमुखता दी गई।

सर्वसमाज के बीच सक्रियता

सुनील भराला की सामाजिक सक्रियता केवल एक समाज तक सीमित नहीं रही। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, अधिवक्ता संगठनों और सेवा गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने व्यापक सामाजिक सरोकारों से जुड़कर काम किया। मेरठ बार एसोसिएशन और इलाहाबाद हाईकोर्ट से उनका जुड़ाव रहा है। भारतीय सेवा संघ तथा अन्य सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से भी उन्होंने समाजसेवा को अपने सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनाया।निःशुल्क विधिक परामर्श तथा जरूरतमंद और निराश्रित लोगों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर काम करने के साथ सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी उनकी सक्रियता रही है।

आंदोलनात्मक राजनीति का भी रहा दौर

सुनील भराला के राजनीतिक जीवन में आंदोलनात्मक सक्रियता का दौर भी रहा। वर्ष 2015-16 के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धाना आंदोलन के दौरान उन्होंने लंबा समय आंदोलन के बीच बिताया। इस दौरान उन्हें 35 दिनों तक घर से बाहर रहना पड़ा तथा उनके आवास की कुर्की ,तोड़ फोड़ और पुलिस तैनाती जैसी परिस्थितियां भी सामने आईं। यह दौर उनके राजनीतिक जीवन में संघर्ष और आंदोलनात्मक सक्रियता से जुड़ा महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।वहीं वर्ष 2010 में बसपा कार्यकाल के दौरान पार्टीहित में आंदोलन किये,जिसमे पुलिस द्वारा निर्ममता से लाठी चार्ज किया जाना तथा उनके महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहना और तत्पश्चात बेड रेस्ट में रहना आदि उनके जीवन के प्रमुख ऐसे पड़ाव रहे जिन्होंने सुनील भराला के राष्ट्रप्रेम और भाजपा के प्रति समर्पण भाव को उजागर किया।

राज्यमंत्री पद के बाद भी जारी रही राजनीतिक सक्रियता

सरकारी दायित्व से मुक्त होने के बाद भी सुनील भराला की राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता जारी रही। जुलाई 2026 में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से उनकी मुलाकात हुई। इस दौरान भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई।इस मुलाकात ने भी यह संकेत दिया कि सरकारी पद से अलग होने के बाद भी संगठन और सामाजिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता बनी हुई है।

उपमुख्यमंत्री की टिप्पणी ने फिर खींचा ध्यान                                       गाजियाबाद के मंच से उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा सुनील भराला का नाम प्रमुखता से लिए जाने के बाद उनके राजनीतिक एवं सामाजिक सफर पर एक बार फिर चर्चा शुरू हुई है।सुनील भराला की यात्रा को व्यापक रूप से देखें तो इसमें तीन प्रमुख आयाम दिखाई देते हैं—पारिवारिक राजनीतिक विरासत, संगठनात्मक अनुभव और सामाजिक-सांस्कृतिक सक्रियता। संघ और जनसंघ की वैचारिक पृष्ठभूमि से मिले राजनीतिक संस्कार से लेकर भाजपा के विभिन्न संगठनात्मक दायित्वों, उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री स्तर की जिम्मेदारी और राष्ट्रीय परशुराम परिषद के माध्यम से सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों तक उनका सफर कई महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरा है। आज सुनील भराला की पहचान केवल किसी एक पद या संगठन के कारण नहीं, बल्कि लंबे राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक सक्रियता और सामाजिक क्षेत्र में निरंतर भागीदारी से बनी है।यही वजह है कि गाजियाबाद के मंच से उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा लिया गया उनका नाम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में चर्चा का विषय बन गया है।                                आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति और सामाजिक संगठनों के बीच सुनील भराला की भूमिका किस रूप में आगे बढ़ती है, यह उनके सार्वजनिक जीवन का अगला महत्वपूर्ण अध्याय होगा।

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